शनिवार, जुलाई 01, 2017

अम्मा का आज जन्मदिन है

पापा का पत्र अम्मा के नाम 


 पम्मी, आज मुझे जीवन के बारे में सोचने का मौका मिला है, मुझे पुराने दिन याद आ रहें हैं,गरीबी के दिन याद आ रहें हैं,वह दिन भी याद आ रहें हैं, जब तुम मेरी पत्नी बनकर आयी थी.
आज में दुबारा खुश हूँ,रात को सोया हूँ या जागा हूँ, कह नहीं सकता, या कोई सपना देखा है यह भी  नहीं बता सकता,पर इतना जानता हूँ कि जबलपुर फूटाताल से शुरू होकर अब तक की बीती हुई यांदें जो दुबारा नहीं जी जा सकतीं,उनमें  जी रहा हूँ.
आज ऊपर वाला दांत टूट गया, मुझे वह दिन याद आ गया, जब मैं और तुम छोटे थे,तुम लईया लेकर आ रही थी मैंने छीनने की कोशिश की थी, तुमने मुझे लात मारकर मुंह के बल गिरा दिया था,दांत पीला पड गया था,आज वही दांत गिर गया.बाद में पता चला था  उस दिन तुम्हारा जन्मदिन था.
मेरी और तुम्हारी उम्र जैसे-जैसे बढती गयी,तुममें और मुझमे प्यार भी बढ़ता गया.
एक दिन मैं अपने कुछ दोस्तों के साथ तुम्हारे दरवाजे तुमसे ब्याह रचाने आ गया,वह क्षण याद आ रहा है जब तुम्हारे भाई ने मेरे सीने में बंदूक रख दी थी और तुमने चीख कर कहा था कि, मैं इस लड़के से शादी करुँगी, मैं तुम्हें अपनी दुल्हन बना कर ले आया,सामाजिकता से गिरे नहीं क्योंकि तुम और मैं
एक ही जाती के थे पर हुआ तो प्रेम विवाह ही था.
मैंने अपने प्रथम मिलन पर तुम्हें एक तस्वीर बना कर दी थी " परिचय का प्रथम क्षण" क्योंकि मैं एक चित्रकार था और यही मेरी रोजी रोटी थी
आज जी भरकर रोया भी हूँ और हंसा भी हूँ क्योंकि अपनी बेवकूफियों की वजह से अपने सुखों को गंवाता रहा. सम्पूर्ण जिन्दगी की यादें दुहरा रहा हूँ सोच रहा हूँ कि कुछ पल उसी जगह पर जाकर बिताऊं जहां तुमने और मैंने प्रेम के बीज बोये थे, बदल तो सब कुछ गया होगा पर नहीं बदली होंगीं सड़कें.
इस जेल ने नयी दिशा दी हैं,नयी आशाएं दी हैं. 


बच्चे बड़े और समझदार हो गएँ हैं सब तुम्हारे ऊपर गये हैं, स्वभाव और कर्म से 
मरने से पहले एक बार तुम्हारी गोद में सर रखकर बहुत देर तक रोना चाहता हूँ.
एक बात बोलूं ---
सुंदर तो तुम जब भी थी 
आज भी हो ---
सेन्ट्रल जेल 
जबलपुर 
15 मई 1974  

शनिवार, जून 17, 2017

पिता -----



अँधेरे को चीरते
सन्नाटे में 
अपने से ही बात करते पिता 
यह सोचते हैं कि कोई उनकी आवाज नहीं सुन रहा होगा 

मैं सुनता हूँ 

कांच के चटकटने सी 
ओस के टपकने सी 
पतली शाखाँओं से दुखों को तोड़ने सी 
सूरज के साथ सुख के आगमन सी 
इन क्षणों में पिता 
व्यक्ति नहीं समुद्र बन जाते हैं 

उम्र के साथ दिशा और दशा बदल जाती है 
नहीं बदलते पिता 
क्योंकि 
उनके जिन्दा रहने का कारण है 
आंसुओं को अपने भीतर रखने की जिद 

पिता 
जीवन के किनारे खड़े होकर 
नहीं सूखने देते कामनाओं का जंगल 
उड़ेलते रहते हैं अपने भीतर का समुद्र 

इसीलिए 
आंसुओं को समेटकर 
अपने कुर्ते में रखने वाले पिता 
अमरत्व के वास्तविक हकदार हैं ------

" ज्योति खरे "

सोमवार, जून 05, 2017

एक हरे पेड़ की तलाश


🔴🌴

निकले थे
गमझे में कुछ जरुरी सामान बांध कर  
किसी पुराने पेड़ के नीचे बैठकर
बीनकर लाये हुए कंडों को सुलगाकर
गक्क्ड़ भरता बनायेंगे
तपती दोपहर की छाँव में बैठकर
भरपेट खायेंगे

सूखे और विकलांग पेड़ों के पास से
एक हरे पेड़ की तलाश में
भटकते रहे

सोचा हुआ कहाँ पूरा हो पाता है

सच तो यह है कि
हमने
घर के भीतर से
निकलने और लौटने का रास्ता
अपनों को ही काट कर बनाया है ----

"ज्योति खरे"